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A Complete Guide to Gayatri Yagya Mantra, Prayer, and Ritual

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A Complete Guide to Gayatri Yagya Mantra, Prayer, and Ritual

Gayatri Yagya Mantra: मंत्र, विधि और हवन प्रक्रिया

Gayatri Yagya Mantra एक पवित्र वैदिक प्रक्रिया है, जिसमें गायत्री मंत्र के माध्यम से शुद्धि, साधना और आत्मिक उन्नति की जाती है। इस लेख में Gayatri Yagya Mantra, पूजा विधि, हवन मंत्र और सम्पूर्ण यज्ञ प्रक्रिया विस्तार से दी गई है। Gayatri Yagya Mantra के अनुसार किया गया यज्ञ व्यक्ति के जीवन में शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति लाता है।

नीचे Gayatri Yagya Mantra के सभी चरण क्रमबद्ध रूप में दिए गए हैं।

1. Gayatri Yagya Mantra के साथ यज्ञारंभ की पवित्र विधि

हाथ जोड़कर मंत्र शुरू करे | 

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यंभर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो नःप्रचोदयात्।।
तूने हमें उत्पन किया, पालन कर रहा है तू | तुझसे ही पाते प्राण हम , दुःखियो के कष्ट हरता है तू ||
तेरा महान तेज़ है, छाया हुआ सभी स्थान | सृष्टि की वस्तु- वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ||
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया | ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ||

2. जल से आचमन करने के मन्त्र

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा || १ || इससे पहला
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा || २ || इससे दूसरा
ॐ सत्यं यश: श्रीर्मयि श्री: श्रयतां स्वाहा || ३ || इससे तीसरा

3. जल से अंगस्पर्श करने के मंत्र

ॐ वाङ्म आस्येऽस्तु ॥ इस मंत्र से मुख का स्पर्श करें
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु ॥ इस मंत्र से नासिक के दोनों छिद्र स्पर्श करें
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों नेत्रों को स्पर्श करें
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों कानों को स्पर्श करें
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों बाहुओं को स्पर्श करें
ॐ ऊर्वोर्म ओजोऽस्तु ॥ इस मंत्र से दोनों जंघाओं को स्पर्श करें
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु ॥ इस मंत्र से शरीर के सभी अंगो पर जल छिड़के |

4. ईश्वर की स्तुति- प्रार्थना – उपासना के मंत्र

ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥१॥
हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत् ।स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमांकस्मै देवाय हविषाविधेम ॥२॥
य आत्मदा बलदा यस्यविश्व उपासते प्रशिषंयस्य देवा: ।यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषाविधेम ॥३॥
य: प्राणतो निमिषतो महित्वैकइन्द्राजा जगतो बभूव।य ईशे अस्यद्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषाविधेम ॥४॥
येन द्यौरुग्रा पृथिवी चदृढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: ।यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषाविधेम ॥५॥
प्रजापते न त्वदेतान्यन्योविश्वा जातानि परिता बभूव।यत्कामास्तेजुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्यामपतयो रयीणाम् ॥६॥
स नो बन्धुर्जनितास विधाता धामानिवेद भुवनानि विश्वा।यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥७॥
अग्ने नय सुपथाराये अस्मान् विश्वानिदेव वयुनानि विद्वान।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥८॥

5. दीपक जलाने का मंत्र

ॐ भूर्भुव: स्व: ॥

6. यज्ञ कुण्ड में अग्निस्थापित करने का मंत्र

ॐ भूर्भुव: स्वर्द्यौरिव भूम्नापृथिवीव वरिम्णा ।तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे॥

7. अग्नि प्रदीप्त करने का मंत्र

ॐ उद् बुध्यस्वाग्नेप्रतिजागृहित्व्मिष्टापूर्ते सं सृजेथामयंच ।अस्मिन्त्सधस्थेअध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्चसीदत ॥

8. घृत की तीन समिधायें रखने के मंत्र

ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान्प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा । 
इदमग्नेयजातवेदसे – इदन्न मम ॥१॥
 इससे पहली समिधा रखें |

ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथम् | आस्मिन हव्या जुहोतन स्वाहा|
इदमग्नये इदन्न मम ||२||
सुसमिद्धायशोचिषे घृतं तीव्रंजुहोतन अग्नये जातवेदसे स्वाहा।
इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम ||३|| 
इन दो मन्त्रों से दूसरी समिधा रखें | 

तन्त्वा समिदि्भरङि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा
।।
इदमग्नेऽङिगरसे इदन्न मम।।४।। इस मंत्र से तीसरी समिधा रखें |

9. पंचघृताहुती

ओम् अयंत इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वद्धर्स्व चेद्ध वधर्य चास्मान्प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा।
इदमग्नये जातवेदसे – इदन्न मम।।१।।
 इस मन्त्र को पाँच बार बोलकर घी की पाँच आहुति दें |

10. जल – प्रसेचन के मन्त्र

ओम् अदितेऽनुमन्यस्व।। इस मन्त्र से पूर्व में
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व।। इससे पश्चिम में 
ओम् सरस्वत्यनुमन्यस्व।। इससे उत्तर में
ओं देव सवितःप्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय।दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नःपुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु।। इस मन्त्र से वेदी के चारों और जल छिड़कावें।

11. चार घी की आहुतियाँ

ओम् अग्नये स्वाहा |
इदमग्नये- इदन्न मम।।
 इस मन्त्र से वेदी के उत्तर भाग में जलती हुई समिधा पर आहुति देवें।

ओम् सोमाय स्वाहा |
इदंसोमाय – इदन्न मम।।
 इस मन्त्र से वेदी के दक्षिण भाग में जलती हुई समिधा पर आहुति देवें।

ओम् प्रजापतये स्वाहा |
इदंप्रजापतये – इदन्न मम।।

ओम् इन्द्राय स्वाहा |
इदंइन्द्राय – इदन्न मम।।
 इन दो मन्त्रों से यज्ञ कुण्ड के मध्य में दो आहुति देवें।

12. प्रातः कालीन आहुति के मन्त्र

ओम् सूर्यो ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: स्वाहा।।१।।

ओम् सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा।।२।।

ओम् ज्योतिः सूर्य: सुर्यो ज्योति स्वाहा।।३।।

ओम् सजूर्देवेन सवित्रा सजूरूषसेन्द्रव्यता जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा।।४।।

ओम् भूरग्नये प्राणाय स्वाहा । इदमग्नये प्राणाय – इदन्न मम।।१।।

ओम् भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा । इदं वायवेऽपानाय -इदन्न मम।।२।।

ओम् स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा । इदमादित्याय व्यानाय-इदन्न मम।।३।।

ओम् भूभुर्वः स्वरिग्नवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा।इदमग्निवाय्वादित्येभ्यःप्राणापानव्यानेभ्यः – इदन्न मम।।४।।

ओम् आपो ज्योतीरसोऽमृतंब्रह्म भूभुर्वः स्वरों स्वाहा।।५।।

ओम् यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरू स्वाहा।।६।।

ओम् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद भद्रं तन्न आसुव स्वाहा ।।७।।

ओम् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा।।८।।

सायंकालीन आहुति के मन्त्र

ओम् अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्नि: स्वाहा ।।१।।

ओम् अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा ।।२।।

इस तीसरे मन्त्र को मन मे उच्चारण करके आहुति देवें |
ओम् अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्नि: स्वाहा ।।३।।

ओम् सजूर्देवेन सवित्रा सजुरात्र्येन्द्रवत्या जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा ।।४।।

ओम् भूरग्नये प्राणाय स्वाहा ।।१।।

ओम् भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा ।।२।।

ओम् स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ।।३।।

ओम् भूर्भुवः स्वरिग्नवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा ।।४।।

ओम् आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा ।।५।।

अब तीन बार गायत्री मन्त्र से आहुति देवें

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यंभर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो नःप्रचोदयात् स्वाहा।।
गायत्री मंत्र को श्रद्धा अनुसार 3, 11, 21, 108 बार कर सकते है |

13. पूर्णाहुति मंत्र

इस मन्त्र से तीन बार बोलकर घी से तीन पूर्णाहुति करें |
ओम् सर्वं वै पूर्णं स्वाहा।।

|| अथ बलिवैश्वदेवविधि: ||

इन दश मंत्रो से घृतमिश्रित भात की, यदि भात न बना हो तो क्षार और लवण को छोड़कर जो कुछ पाक में बना हो उसी की दश आहुति करे |
ॐ अग्नेय स्वाहा || १ ||
ॐ सोमाय स्वाहा || २ ||
ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा || ३ ||
ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य: स्वाहा || ४ ||
ॐ धन्वन्तरये स्वाहा || ५ ||
ॐ कुह्वै स्वाहा || ६ ||
ॐ अनुमत्यै स्वाहा || ७ ||
ॐ प्रजापतये स्वाहा || ८ ||
ॐ धवापृथिवीभ्यां स्वाहा || ९ ||
ॐ स्विष्टकृते स्वाहा || १० ||

14. प्रार्थना

पूजनीय प्रभु हमारे भाव उज्जवल कीजिये ।
छोड़ देवें छल कपट को मानसिक बल दीजिये ॥ १॥
वेद की बोलें ऋचाएं सत्य को धारण करें ।
हर्ष में हो मग्न सारे शोक-सागर से तरें ॥ २॥
अश्व्मेधादिक रचायें यज्ञ पर-उपकार को ।
धर्मं- मर्यादा चलाकर लाभ दें संसार को ॥ ३॥
नित्य श्रद्धा-भक्ति से यज्ञादि हम करते रहें ।
रोग-पीड़ित विश्व के संताप सब हरतें रहें ॥ ४॥

भावना मिट जाये मन से पाप अत्याचार की ।
कामनाएं पूर्ण होवें यज्ञ से नर-नारि की ॥ ५॥
लाभकारी हो हवन हर जीवधारी के लिए ।
वायु जल सर्वत्र हों शुभ गंध को धारण किये ॥ ६॥
स्वार्थ-भाव मिटे हमारा प्रेम-पथ विस्तार हो ।
‘इदं न मम’ का सार्थक प्रत्येक में व्यवहार हो ॥ ७॥
प्रेमरस में मग्न होकर वंदना हम कर रहे ।
‘नाथ’ करुणारूप ! करुणा आपकी सब पर रहे ॥ ८॥

सुखी बसे संसार सब

सुखी बसे संसार सब, दुखिया रहे न कोय |
यह अभिलाषा हम सबकी, भगवन ! पूरी होय ||
विद्या बुधि तेज बल, सबके भीतर होय |
दूध पूत धन-धान्य से, वंचित रहे न कोय ||
आपकी भक्ति प्रेम से, मन होवे भरपूर |
राग-द्वेष से चित्त मेरा, कोसों भागे दूर ||
मिले भरोसा आपका, हमें सदा जगदीश |
आशा तेरे नाम की, बनी रहे मम ईश ||
पाप से हमें बचाइये , करके दया दयाल |
अपना भक्त बनायकर, सबको करो निहाल ||
दिल में दया उदाहरता, मन में प्रेम-अपार |
हृदय में धीरता वीरता, सबको दो करतार ||
नारायण तुम आप हो, पाप विमोचन हर |
दूर करो अपराध सब, कर दो भाव से पार ||
हाथ जोड़ विनती करूं, सुनिए कृपा निधान |
साधु-संगत सुख दीजिए, दया नम्रता दान ||

ॐ है जीवन हमारा

ॐ है जीवन हमारा ॐ प्राणा धार है
ॐ है करता विध्याता ॐ पालनहार है

ॐ है दुःख का विनाश्यक ॐ करुनाकंद है
ॐ है बल तेज धारी ॐ सर्व नन्द है

ॐ सब का पूज्य है ॐ का पूजन करे
ॐ ही के ध्यान से हम शुद्ध अपना मन करे

ॐ के गुरु मन्त्र जपने से रहेगा शुद्ध मन
बुद्धि दिन प्रति दिन धर्म में होगी लग्न

ॐ के जप से हमारा ज्ञान बड़ता जाएगा
अंत में ॐ हम को मुक्ति तक पहुचायेगा

तेजोऽसि तेजो मयि धेहि

तेजोऽसि तेजो मयि धेहि,
वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि |
बलमसि बलं मयि धेहि,
ओजोऽस्य ओजो मयि धेहि |
मन्युरसी मन्युं मयि धेहि,
सहोअसि सहो मयि |

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दुःखभाग भवेत ॥

ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शान्तिः

ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शान्तिः, पृथिवी शान्ति रापः शान्ति रोषधयः शान्तिः ।
वनस्पतयः शांति र्विश्वेदेवः शांति र्ब्रह्म शांतिः, सर्वं शांतिः शांतिरेव शांतिः सामा शांतिरेधि ॥ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

हे प्रभु आनंद-दाता 

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये,शीघ्र सारे अवगुणो को दूर हमसे कीजिए ।

आरती जगदीश जी की

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ॥॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ॥॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ॥॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे ।
अपने हाथ उठाओ,  अपने शरण लगाओ,  द्वार पड़ा तेरे ॥॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी कष्ट हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा प्रेम बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ॥॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

जय जगदीश जी की आरती जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे ||॥
ॐ जय जगदीश हरे..॥

समाप्त यज्ञ

त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।
त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव ।
त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥

Gayatri Yagya Mantra का नियमित पालन करने से वातावरण शुद्ध होता है और साधक को मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

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